रविवार, 14 जून 2015

मौन

मौन
एक भाषा है
कभी बोलकर तो देखिये
दिल में जो बात आ रही है
कभी
दिल में ही तोलकर तो देखिये
कभी कहीं कड़वाहट लगे
उसमे
मिठास घोलकर तो देखिये
अपना तो अपना है
पराया भी अपना हो जायेगा

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

दो मीठे बोल

बेचारा दिल
क्या चाहे ,
बस सुनना  चाहे
दो मीठे बोल
तोल  तोल  कर  बोल
बस
दो मीठे बोल

बेचारा दिल
जब जब सुने
किसी के भी
दो मीठे बोल
खुश होकर
बस डोल  डोल

वाह रे वाह
दो मीठे बोल 

रविवार, 12 अप्रैल 2015

दर्द

दर्द जहाँ  होता है
वहीँ तो दिल होता है
वर्ना
जहाँ दिल ही नहीं हो
उन्हें
क्या पता
कि
दर्द  क्या होता है

कहा ज़रूर किसी ने
कि
मर्द को दर्द नहीं होता
लेकिन
किसी कर दर्द देख
जिसे दर्द होता है
वही तो
सच्चा  मर्द होता है
एक बार फिर कहूँ
दर्द जहाँ  होता है
वहीँ तो दिल होता है 

मंगलवार, 24 मार्च 2015

बेचारा दिल

बेचारा दिल 
किससे  शिकवा करे 
कब और कैसे शिकवा करे 

दिल का दिल जो चाहे 
वो हमेशा होता नहीं 
और 
जो हमेशा होता रहता है 
वो 
दिल का दिल चाहता नहीं 

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

?




प्रश्न पूछिये
अपने  आप से
सिर्फ
एक बार
प्रश्न पूछिये
ज़िन्दगी
अब नहीं
तो

कब जीयेंगे 

रविवार, 21 दिसंबर 2014

दोस्त

आपने कभी  अपने आपको
आईने में  देखा  है
आपका दाहिना हाथ
आईने में
आप ही का  बायाँ  हाथ क्यों हो जाता है
आप ही का  बायाँ हाथ
आप ही का दाहिना हाथ क्यों हो जाता है

क्योंकि
वो बार बार आपसे कहता है
ऐ दोस्त
कहाँ सिर्फ बाहर ही बाहर
अपने दोस्त ढूंढ़ता है
एक बार अपने लिए
अपना हाथ बढ़ाकर तो देख
सिर्फ एक बार
अपने को
अपना ही
दोस्त बनाकर तो देख
 

लेकिन
हम हैं कि
रोज़
सबकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाते चले जाते हैं
और
अपने आपको भुलाये चले जाते हैं
आज फिर एक मौका है
जब भी आइना देखे
आईने की बात मानकर देखे
एक बार सिर्फ एक बार
अपने आपको
अपना
दोस्त बनाकर तो देखिये
ज़िन्दगी जीने
का
अंदाज़ ही बदल जायेगा

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

इन्सान



दुनिया बनाने वाले ने
जब भी दुनिया बनाई
बड़े
सोच समझकर
अच्छी भली दुनिया बनाई

सुन्दर सुन्दर पक्षी
अच्छे भले जानवर
और
सबसे समझदार
इन्सान

सारे पशु पक्षी
छोटे बड़े जानवर
यहां तक कि
खूंखार से खूंखार
जानवर भी
एक दूसरे के साथ
आराम से शान्ति से रह लेते हैं

लेकिन
इन्सान  ने तो अपनी मर्ज़ी से
अपनी एक नयी दुनिया ही बना डाली
इन्सान  ने अपनी दुनिया को ऐसा बांटा
कि
इन्सान  से इन्सान ही बँट गया
कहीं
मुल्कों की सरहदें हैं
तो कहीं
रियासतो  की सरहदें हैं
कहीं
मजहबों का
कहीं सम्प्रदायों का
बँटवारा है
तो
कहीं
इन्सान
भाषा से बंटा है

और
इस बँटवारे से
इन्सान
ऐसा हो गया
कि
अपनी पहचान
देश से
रियासत से
मज़हब से
सम्प्रदाय  से
भाषा  से
तो
करवाता है
पर
कहीं भी इन्सान
इन्सान  की तरह अपनी पहचान
नहीं करवा पाता है


काश
हम इतनी  बड़ी दुनिया में
सिर्फ इन्सानों  की
एक अच्छी
दुनिया बना पाते