कविता
ख़ुशी गम
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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
ख़ुशी गम
नीली छतरी वाले की
अजब माया है
कहीं दीखता नहीं है
पर
सभी ओर छाया है
कहीं खुशियाँ इतनी
कि
समंदर भी छोटा पड़ जाये
और
कहीं ग़मों का है अम्बार
ऐसा कि
इंसान ग़मों के बोझ के नीचे दबा जाता है
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