मंगलवार, 21 अगस्त 2012

खुशियों की दुकान

काश
खुशियों की कोई दुकान होती 
खुशियाँ खरीद लाते 
और 
हमेशा खुश नज़र आते 

लेकिन 
इसमें भी तो तकलीफ है 
खुशियाँ 
अगर दुकानों पर बिकती 
तो सरकारें उस पर भी 
कोई न कोई कर ज़रूर लगाती 


हर बजट में 
खुशियाँ भी महँगी होती 

गरीब 
जो गुज़ारा भी नहीं कर पाते 
भूखों तो मरते ही मरते 
हमेशा दुखी भी रहते 
क्योंकि 
खुशियाँ खरीद नहीं पाते 


खुशियों की भी कालाबाजारी होती 

गेस सिलेंडर की तरह 
खुशियाँ भी ब्लेक में मिला करती 

घर में बैठे बूड़े माँ - बाप
अपने कमाऊ पूतों से 
खुशियाँ लाने की मिन्नतें करतें

कुछ आज्ञाकारी पुत्र 
तो 
अपने माँ -बाप के लिए 
ढेरों खुशियाँ ले आते 
और 
कुछ ढीठ बच्चे 
अपनी बीबी और बच्चों के लिए 
ढेरों खुशियाँ ले आते 
पर 
अपने माँ -बाप के सामने  
महंगाई का रोना रोते 
और 
बिचारे माँ -बाप 
चुपचाप मन मसोसकर रह जाते 
फिर भी 
अपने बच्चों को 
दिल से 
सुखी रहने  का आशीर्वाद दिया करते  

सोमवार, 20 अगस्त 2012

ज़िन्दगी का किस्सा


हर  शख्स 
की 
ज़िन्दगी
अलग सा किस्सा है 

इस किस्से 
में 
किसी और ज़िन्दगी का 
कितना हिस्सा है 
यह भी 
किस्से- किस्से का 
किस्सा है  

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

इश्क

नज़रों के मिलने
के
इतफाक भर से
इश्क
नहीं हो जाता है

दो दिलों के
मिलने से
इश्क
हो ही जाता है

और

इश्क
जब हो जाता है
तब
दिल तो बस खो ही जाता है

अधर कुछ कह नहीं पाते हैं
बस
नज़रें ही जुबां बन जाती हैं    

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

खाली हाथ

इस दुनिया में जो हम आते हैं
क्या साथ लेकर आते हैं ?
सभी जानते हैं
समझते हैं
कुछ नहीं लेकर आते हैं
फिर भी
पूरी उमर
वो सब इकट्ठा करने में लगा देते हैं
जिसे
हम सब इसी दुनिया
में
छोड़कर
खाली हाथ चले जाते हैं    

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

सार्थक जीवन



हिना पिस पिस जाती है
किसी और की सुन्दरता के लिए
अदरख कुट कुट जाती है
किसी और के स्वाद के लिए

ऐसे ही जो लोग
कुट जाते हैं, पिस जाते है
दूसरों के लिए
औरों की ख़ुशी के लिए
औरों की भलाई के लिए
वे
अपना जीवन तो जी नहीं पाते हैं
पर
अपना जीवन सार्थक कर जाते हैं 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

अपनी अपनी दुनिया

इस दुनिया में 
हर शख्श 
अपनी एक अलग दुनिया 
बना लेता है 
और 
उस दुनिया की शतरंज में
कभी राजा ,
कभी  वजीर 
कभी हाथी ,घोडा, ऊंट 
तो 
कभी प्यादा 
बन जाता है 
इस तरह  
हर शख्श 
अपनी अपनी दुनिया  
में 
पूरा जीवन जी जाता है  
अपने हिस्से  की 
ज़िन्दगी  की 
हाला पी जाता है















सोमवार, 2 जनवरी 2012

स्वागत २०१२

दो हजार ग्यारह
हुआ नौ दो ग्यारह
कहीं लाया खुशियाँ ही खुशियाँ
कहीं छोड़ गया सिर्फ गम ही गम

दो हजार बारह आया है
देखना है
अपने पिटारे में
क्या क्या भरके लाया है

सोचना क्या
जो भी होगा देखा जायेगा
अभी तो बस यही शुभेच्छा है
दो हज़ा बारह
में
सबकी हो पौ बारह